“भटकती यादें और बुझती संवेदनाएं: दादी को पीटने वाले पोते ने छीनी बुजुर्ग की आखिरी सांस”

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भोपाल| राजधानी से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक 95 वर्षीय बुजुर्ग महिला की मौत उसके पोते के हाथों पिटाई के कारण हो गई। यह घटना मानवता और पारिवारिक रिश्तों के गिरते स्तर को उजागर करती है। वृद्धा की उम्रजनित मानसिक कमजोरी, जिसे परिवार का साथ मिलना चाहिए था, वही उपेक्षा और क्रूरता में बदल गई।

भूलने की बीमारी बनी परेशानी, उपेक्षा बनी जीवन का हिस्सा

अवतारी बाई गौड़, जो उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की रहने वाली थीं, बीते महीने ही अपने बेटे के साथ रहने भोपाल आई थीं। उम्र बढ़ने के साथ उनकी याददाश्त कमजोर हो गई थी, जिससे वह बार-बार घर से निकलकर भटक जाती थीं। एक दिन पहले ही वे घर से गायब हो गई थीं और पास की नाली में पड़ी मिली थीं। परिवार के लिए यह समस्या बन चुकी थी। उनका बेटा और बेटी दोनों ही उन्हें एक-दूसरे के पास भेजते रहे। बेटा जब झुंझला गया तो कुछ समय बाद अवतारी बाई को बेटी के घर भेज दिया। लेकिन वहां से भी जब वे भटक गईं तो बेटी ने उन्हें दोबारा बेटे के पास भेज दिया।

क्रूरता की हद: पोते ने बरसाए चेहरे पर मुक्के

गोविंदपुरा थाना पुलिस के अनुसार, घटना वाले दिन वृद्धा एक बार फिर से घर से निकलने लगी थीं। इसी बात से नाराज पोते कार्तिक ने उनकी पिटाई कर दी। उसने दादी के चेहरे पर कई मुक्के बरसाए। पिटाई के कुछ देर बाद ही वृद्धा की मौत हो गई। घटना के बाद आरोपी पोते कार्तिक को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। प्रारंभिक पूछताछ में उसने कहा कि नाली में गिरने से लगी चोटों के कारण उनकी मौत हुई है। हालांकि पुलिस को आशंका है कि पोते की मारपीट ही असल वजह हो सकती है।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से खुलेगा मौत का रहस्य

पुलिस ने सोमवार को वृद्धा का शव पीएम के लिए भेजा है और मंगलवार को शॉर्ट पीएम रिपोर्ट आने के बाद ही मृत्यु का स्पष्ट कारण सामने आ पाएगा। इसके आधार पर कार्तिक के खिलाफ उचित धाराओं में मामला दर्ज किया जाएगा।

निर्माणाधीन भवन में कर रहा था बेटा चौकीदारी

थाना प्रभारी अवधेश सिंह तोमर ने बताया कि अवतारी बाई का बेटा जीत बहादुर सिंह गौतम नगर क्षेत्र में एक निर्माणाधीन इमारत में चौकीदारी का काम करता है और वहीं अपने परिवार के साथ रहता है। वहीं वृद्धा को भी एक माह पहले गोरखपुर से भोपाल लाया गया था।

इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या आधुनिक समाज में वृद्धजनों के लिए परिवार ही सबसे असुरक्षित स्थान बनता जा रहा है? क्या उम्र के इस पड़ाव पर जहां उन्हें सहारा मिलना चाहिए, वहां क्रोध और हिंसा उनका इंतज़ार करती है?

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