
भोपाल। राजधानी के ऐशबाग फ्लाईओवर ब्रिज निर्माण को लेकर उठे विवाद पर बुधवार को हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। अदालत के समक्ष मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MANIT) के प्रोफेसर द्वारा तकनीकी जांच रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार ब्रिज का मोड़ 90 डिग्री नहीं, बल्कि 118 से 119 डिग्री के बीच है।
कैसे शुरू हुआ विवाद
यह मामला तब सामने आया जब खबरें आईं कि फ्लाईओवर में 90 डिग्री का खतरनाक मोड़ बना दिया गया है। इस पर सरकार ने पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की। समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि ब्रिज के मोड़ वाले हिस्से के नीचे रेलवे ट्रैक गुजरता है और राज्य सरकार तथा रेलवे विभाग के बीच समन्वय की कमी रही। यही कारण रहा कि ब्रिज के खंभे भी निर्धारित मानकों के अनुसार दूरी पर नहीं लगाए जा सके।
याचिकाकर्ता का पक्ष
मामले की सुनवाई पुनीत चड्ढा की कंपनी की ओर से दाखिल याचिका पर हो रही है। कंपनी का कहना है कि फ्लाईओवर निर्माण का ठेका 2021-22 में मिला था और पूरा कार्य सरकारी एजेंसी द्वारा जारी जनरल अरेंजमेंट ड्रॉइंग (GAD) के आधार पर किया गया। बाद में 2023 और 2024 में जीएडी में संशोधन भी किए गए, लेकिन कंपनी को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि सरकार ने बिना सुनवाई का अवसर दिए ही कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया।
हाईकोर्ट की कार्यवाही
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए MANIT के प्रोफेसर से तकनीकी जांच करवाई। इसके लिए याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये फीस देने का निर्देश भी दिया गया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जांच में कंपनी का दावा सही पाया जाता है, तो वह फीस की राशि वापस पाने की हकदार होगी।
बुधवार को पेश हुई रिपोर्ट में साफ कहा गया कि फ्लाईओवर का मोड़ 118 से 119 डिग्री के बीच है, न कि 90 डिग्री जैसा कि पहले बताया गया था। इसके बाद सरकार ने अदालत से समय मांगते हुए कहा कि वह रिपोर्ट के आधार पर कंपनी के खिलाफ की गई कार्रवाई को निरस्त करने पर विचार करेगी। अदालत ने सरकार के इस आग्रह को स्वीकार कर लिया।
अब इस मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को होगी। फिलहाल कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अंतिम निर्णय आने तक कंपनी के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी।
ऐशबाग फ्लाईओवर राजधानी भोपाल के व्यस्ततम क्षेत्रों को जोड़ता है और हजारों वाहन प्रतिदिन यहां से गुजरते हैं। यदि ब्रिज की डिजाइन और संरचना में तकनीकी त्रुटि साबित होती है, तो यह न केवल सुरक्षा का बड़ा खतरा होगा बल्कि जिम्मेदारी तय करने में भी कई सरकारी एजेंसियों और ठेकेदार कंपनी पर सवाल खड़े होंगे।










