“बेंगलुरु बना ठगी का अड्डा: विदेश से ऑपरेट, 3000 करोड़ की साइबर लूट!”

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||बेंगलुरु|| भारत में अब तक का सबसे बड़ा साइबर ठगी का मामला सामने आया है, जिसमें एक अंतरराष्ट्रीय गिरोह ने देशभर में हजारों लोगों को ठगकर करीब 3,000 करोड़ रुपये की अवैध कमाई की है। गिरोह के सरगना थाईलैंड और कंबोडिया में बैठकर पूरे ऑपरेशन को संचालित कर रहे थे, जबकि गिरोह का भारतीय मुख्यालय बेंगलुरु में स्थापित था। यहां से ही एक कंपनी के जरिए देशभर में 100 से अधिक फर्जी कंपनियां चलाई जा रही थीं, जिनका मकसद सिर्फ ठगी से मिले पैसों को मैनेज और मनी लॉन्डरिंग करना था।

गिरफ्त में आए दो आरोपी, बड़े खुलासे

पुलिस ने गिरोह से जुड़े दो प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनकी पहचान रोहित श्रीवास्तव और एक अन्य सहयोगी के रूप में हुई है। पूछताछ में सामने आया है कि यह पूरा नेटवर्क बेहद संगठित और कॉर्पोरेट ढांचे में काम कर रहा था। हर दिन करीब एक करोड़ रुपये की अवैध रकम फर्जी कंपनियों के खातों से मूल कंपनी के खाते में ट्रांसफर की जाती थी। इस गिरोह की जांच की शुरुआत अप्रैल 2025 में राजस्थान के धौलपुर जिले के बाड़ी थाने में दर्ज एक शिकायत से हुई। एक शिक्षक ने 15 लाख रुपये की साइबर ठगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। जब पुलिस ने जांच शुरू की और ट्रांजेक्शन का रूट खंगाला तो एक के बाद एक सैकड़ों बैंक खातों और फर्जी कंपनियों की परतें खुलती गईं। ठगी में शामिल मुख्य कंपनी का नाम “एबुंडेंस” है, जिसका हेडक्वार्टर बेंगलुरु में है। यह कंपनी “ट्राई-पे” नाम से एक डिजिटल पेमेंट ऐप भी संचालित करती थी। केवल इसी कंपनी के एक खाते पर अब तक 5,000 से अधिक शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं, लेकिन बैंक ने न तो खाता फ्रीज किया और न ही कोई कार्रवाई की।

इस साइबर गिरोह का नेटवर्क चार स्तरों पर काम कर रहा था —

1. ऑनबोर्डिंग एजेंट: जो फर्जी कंपनियां खुलवाते थे और उसके लिए सभी दस्तावेज (पैन कार्ड, रजिस्ट्रेशन, जीएसटी, वेबसाइट, ऑफिस, आदि) तैयार करते थे।

2. रीसेलर टीम: दस्तावेजों की वैरिफिकेशन, ऑफिस सेटअप, और बैंक एजेंटों से साठगांठ करने का जिम्मा।

3. टेक्निकल टीम: क्यूआर कोड बनाना, लिंक जनरेट करना, चैट के माध्यम से ठगी करना और ट्रांजेक्शन को मूल खातों तक पहुंचाना।

4. लीगल सपोर्ट टीम: विवादों को निपटाने और पुलिस/प्रशासन को मैनेज करने की जिम्मेदारी।

भारत में बने फर्जी डायरेक्टर — गरीबों को बनाया चेहरा

गिरोह ने फर्जी कंपनियों के डायरेक्टर के तौर पर गरीब और अनपढ़ लोगों को चुना।

केस 1: रुकनैक कंपनी — दिल्ली के रोहिणी में हेडक्वार्टर, टर्नओवर 100 करोड़। इसके डायरेक्टर दंपती कच्ची बस्ती में एक कमरे में रहते हैं और केवल ₹27,000 प्रति माह कमाते हैं।

केस 2: जोविक कंपनी — टर्नओवर 80 करोड़। डायरेक्टर शिवानी पहले एक सिक्योरिटी गार्ड थी।

सरकार और बैंकिंग सिस्टम की नाकामी

इस पूरे मामले में बैंकिंग और प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही सामने आई है। एक ही बैंक खाते पर 5,000 से अधिक शिकायतों के बावजूद खाता अब तक फ्रीज नहीं किया गया, जिससे करोड़ों रुपये की ठगी जारी रही।

यह केस केवल एक साइबर अपराध की कहानी नहीं, बल्कि भारत की बैंकिंग और साइबर सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। अंतरराष्ट्रीय गिरोहों द्वारा इस प्रकार के संगठित अपराध को अंजाम देना यह दर्शाता है कि हमें सिर्फ कानून नहीं, बल्कि उसकी तेजी से और प्रभावी कार्यवाही की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी।

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