
नई दिल्ली/बीजिंग। चीन तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी (यारलुंग सांगपो) पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बना रहा है, जिसकी लागत करीब 14.4 लाख करोड़ रुपये है। यह प्रोजेक्ट साल 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य है और इससे बनने वाली बिजली चीन के मौजूदा ‘थ्री गॉर्जेस डैम’ से तीन गुना ज्यादा होगी। चीन का दावा है कि यह परियोजना ऊर्जा उत्पादन और कार्बन न्यूट्रल लक्ष्य के लिए है, लेकिन इसके पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक खतरे भी तेजी से सामने आ रहे हैं।
भारत और बांग्लादेश को क्यों है चिंता?
भारत और बांग्लादेश दोनों ने इस बांध से जल प्रवाह में बदलाव, बाढ़ और सूखे की आशंका जताई है। भारत के पूर्वोत्तर में खासकर अरुणाचल प्रदेश के नेता इसे “वॉटर बॉम्ब” कहकर चिंता जता चुके हैं। उनका कहना है कि चीन जब चाहे तब भारत के राज्यों में अचानक पानी छोड़ सकता है, जिससे बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
पर्यावरणीय खतरे भी गंभीर
यह बांध भूकंपीय क्षेत्र में बन रहा है, जिससे भूकंप का खतरा बना रहता है। इसके अलावा, इस इलाके की जैव विविधता और नदी की प्राकृतिक प्रवाह व्यवस्था पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
भारत की तैयारी: सियांग मल्टीपर्पस प्रोजेक्ट
चीन के खतरे से निपटने के लिए भारत ने अरुणाचल प्रदेश में सियांग मल्टीपर्पस प्रोजेक्ट की योजना बनाई है। इस बांध की लागत करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है, जो चीन के बांध के प्रभावों को संतुलित करने में मदद करेगा। यह बांध करीब 9 अरब घन मीटर पानी स्टोर करेगा और 11 हजार मेगावॉट बिजली पैदा करेगा।
लेकिन योजना अटकी क्यों है?
हालांकि, यह प्रोजेक्ट स्थानीय विरोध और धीमी प्रक्रिया के चलते अटका पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को तेजी से कदम उठाने होंगे, नहीं तो चीन की यह रणनीति जल-राजनीति में बड़ी बढ़त बन सकती है।
चीन का यह डैम सिर्फ एक ऊर्जा परियोजना नहीं, बल्कि कूटनीतिक दबाव का हथियार भी बन सकता है। भारत के लिए समय की मांग है कि वह अपनी योजनाओं को तेज करे और इस जल संकट से निपटने की मजबूत रणनीति तैयार करे।










