
||इंदौर||मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी स्वयं आय अर्जित कर रही है, तो भी पति की पारिवारिक जिम्मेदारियाँ समाप्त नहीं हो जातीं। विशेष रूप से तब, जब पत्नी के साथ एक नाबालिग संतान भी हो, पति को भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभानी ही होगी।यह फैसला उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिसमें इंदौर निवासी एक महिला ने अपने पति के विरुद्ध भरण-पोषण की मांग की थी। महिला का आरोप था कि उसका पति अन्य महिलाओं से अवैध संबंध रखता है और उसके ससुर द्वारा भी उस पर गलत नियत रखी जाती थी, जिससे विवश होकर वह अपने मायके में रह रही है।
हालाँकि, कुटुंब न्यायालय ने पति के इस तर्क को स्वीकार करते हुए कि पत्नी खुद कमाती है और स्वेच्छा से ससुराल छोड़कर मायके में रह रही है, भरण-पोषण की याचिका खारिज कर दी थी। इस फैसले के विरुद्ध महिला ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की।
हाई कोर्ट की टिप्पणी:
हाई कोर्ट ने कुटुंब न्यायालय के फैसले को निरस्त करते हुए कहा कि –
“केवल इस आधार पर कि पत्नी स्वयं कमा रही है, पति को उसकी तथा नाबालिग बेटी की देखभाल और भरण-पोषण से मुक्त नहीं किया जा सकता। वैवाहिक संबंधों के तहत पति की कुछ नैतिक और कानूनी जिम्मेदारियाँ होती हैं, जिन्हें वह पत्नी की आमदनी का बहाना लेकर नहीं टाल सकता।”
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पति एक व्यवसायी है और उसके द्वारा ऐसा कोई दस्तावेज़ या प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह सिद्ध हो सके कि वह आर्थिक रूप से असमर्थ है या उसे कमाई में कोई अड़चन है। अतः उसे भरण-पोषण से छूट नहीं दी जा सकती।
अदालत का आदेश:
अदालत ने आदेश दिया कि पति अपनी पत्नी और नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए हर माह ₹17,000 की राशि प्रदान करेगा। इस राशि को महिला की आवश्यकताओं और बेटी की परवरिश को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया गया।
यह निर्णय उन कई मामलों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है, जहाँ पति यह तर्क देते हैं कि पत्नी की कमाई के चलते उन्हें भरण-पोषण देने की आवश्यकता नहीं है।
यह फैसला पुनः स्थापित करता है कि भरण-पोषण का अधिकार पत्नी और बच्चों का वैधानिक संरक्षण है, और यह पति की आर्थिक स्थिति, पत्नी की आवश्यकताओं, तथा संतान की परवरिश के अधिकारों को ध्यान में रखकर तय किया जाता है।
कानूनी दृष्टिकोण से भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत, यदि पत्नी स्वयं की देख रेख के लिए पर्याप्त साधन नहीं रखती है, या बच्चों की आवश्यकताएँ पूरी नहीं कर पा रही है, तो पति को भरण-पोषण देना अनिवार्य होता है, भले ही पत्नी आंशिक रूप से कमाती हो।










