
भोपाल। बिहार विधानसभा चुनाव में मतदाता सूची शुद्धिकरण को लेकर उठे विवाद की राजनीतिक लहर अब मध्य प्रदेश तक पहुँच गई है। कांग्रेस पार्टी ने दावा किया है कि राज्य में 2023 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर हेरफेर हुआ है, जिसके चलते चुनावी नतीजे प्रभावित हुए। बीजेपी पर सीधे निशाना साधते हुए कांग्रेस ने एक व्यापक जांच अभियान शुरू करने की घोषणा की है, जिसके तहत 65 हजार प्रशिक्षित कार्यकर्ता प्रदेश के हर बूथ पर जाकर मतदाता सूची की घर-घर पड़ताल करेंगे।
कांग्रेस का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य यह पता लगाना है कि जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए या जोड़े गए, वह प्रक्रिया चुनाव आयोग के नियमों के तहत सही तरीके से हुई या नहीं। पार्टी ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बदलाव के पीछे राजनीतिक साज़िश थी, जिससे विपक्षी वोट बैंक को कमजोर करने की कोशिश की गई।
जनवरी 2026 तक रिपोर्ट सौंपने का लक्ष्य
प्रदेश कांग्रेस संगठन महामंत्री संजय कामले ने बताया कि 230 विधानसभा क्षेत्रों के प्रभारी इसी माह नियुक्त कर दिए जाएंगे और बूथ लेवल एजेंट्स को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। ये एजेंट्स चिन्हित घरों में जाकर वोटरों से व्यक्तिगत रूप से जानकारी लेंगे और दस्तावेजों की जांच करेंगे।
कामले के अनुसार, यह डेटा संकलित कर जनवरी 2026 तक एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसे चुनाव आयोग और पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को सौंपा जाएगा।
“यह लोकतंत्र बचाने की लड़ाई है” – जीतू पटवारी
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा, “यह सिर्फ जांच नहीं, बल्कि लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है। बीजेपी ने चुनाव को प्रभावित करने के लिए मतदाता सूचियों में सुनियोजित तरीके से हेरफेर किया। हमारी रिपोर्ट ‘चुनाव चोरी’ के पूरे सच को सामने लाएगी।”
पटवारी ने यह भी घोषणा की कि कांग्रेस आने वाले महीनों में “चुनाव चोरी” शीर्षक से एक विस्तृत दस्तावेज जारी करेगी, जिसमें मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के सभी सबूत और आंकड़े शामिल होंगे।
राजनीतिक माहौल में गरमी
विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस का यह कदम न सिर्फ बीजेपी पर सीधा हमला है, बल्कि 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी का हिस्सा भी है। दूसरी ओर, बीजेपी ने अब तक इन आरोपों पर औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव पूरी तरह कानूनी और चुनाव आयोग की देखरेख में हुआ है।
आने वाले महीनों में यह मुद्दा मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़ा चुनावी हथियार बन सकता है, जिसका असर सिर्फ राज्य तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय राजनीति में भी महसूस किया जा सकता है।










